विरह
विरह कभी भी
वास्तविक नहीं हो सका,
हालांकि
शारीरिक
विच्छेद हुआ है
किन्तु मानसिक
एकाकीपन न ला सका,
क्योंकि
कितने ही
प्रेमियों ने जिया है
प्रेमिका के सान्निध्य को
अपनी कल्पनाओं में
उसके चले जाने के
पश्चात भी,
कितने ही प्रेमियों ने
उकेरा है
प्रेमिका संग
प्रगाढ़ आलिंगन को
अपने ख्यालों के कैनवास पर,
और कितने ही
प्रेमियों ने
चखे हैं अधरों के
कोमल कंपोल स्पर्श को
प्रेमिका की
धुंधली पुरानी तस्वीरों में,
कितने प्रेमी तो
सर्द रातों में
महसूस कर लेते हैं
बदन की गर्मी को
भींच कर तकिया
अपनी बाजुओं में
प्रेमिका की मानिंद,
कितने प्रेमियों ने
स्वप्न में
महसूस किया है
माशूक के गीले
गेसुओं को अपने गालों पर,
और
कितने प्रेमी
आनंदित हुए हैं
महसूस कर के
प्रेमिका का हांथ
दुःख की घड़ी में
अपने
बेतरतीब उलझे बालों पर......!!
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