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अपना ख़्याल रखा करो

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 ••••••••••••••••••••••••••••••••••••••• मेरी ज़रूरतों पर ज़रा नीयत-ए-हलाल रखा करो, कि बेशकीमती हो तुम मेरी जां, तुम अपना ख्याल रखा करो.......१ न जेहन में कोई शिकवा न निगाह में कोई सवाल रखा करो, कि मेरी अमानत हो तुम मेरी जां, तुम अपना ख़्याल रखा करो.......२ अपने लब पे मेरा नाम और मेरे होंठों पे अपना ज़माल रखा करो, कि मेरी मोहब्बत हो तुम मेरी जां, तुम अपना ख़्याल रखा करो.......३ हमारे रब्त में इफ्फत और ज़हन में आज़-ए-विसाल रखा करो, कि मेरी इबादत हो तुम मेरी जां, तुम अपना ख़्याल रखा करो........४ अपने होंठों पर नाज़नीन हँसी और ज़हन को खुश- हाल रखा करो, कि मेरी हसरत हो तुम मेरी जां, तुम अपना ख़्याल रखा करो........५ मेरे हांथो में हांथ अपने और अब्स में अपने ग़ज़ाल रखा करो, कि मेरी उल्फ़त हो तुम मेरी जां, तुम अपना ख़्याल रखा करो.......६ •••••••••••••••••••••••••••••••••••••••
  3 यूं तो हर सिफ्त काबिल-ए-तौसीफ़ है मेरे क़िरदार में, मगर मुझको जो मोहब्बत मेरी आवारगी से है वो बात किसी और में नहीं.....!! 4 हर एक आहट पे तुम आओ ये मुमकिन तो नहीं, मगर हर एक आहट पे तुम आए हो ऐसा लगता है मुझे.....!! 5 बहुत शर्मिन्दा किया  फिर हमको तेरी आदत ने ओ जाना, वो तेरे बाद जिस तरह हम अपनी आंखो में तेरा अक्स  ले के घूमे हैं....!!

अभिनय या हकीकत

 कुछ लोग रंगमंच पर करते हैं अभिनय और बखूबी उकेर कर  रख देते हैं  दुनिया भर के तमाम  दुःख-दर्द-द्वेष-खुशी-करुणा-प्रेम और न जाने कितने ही अन्य भावों को प्रशंसा के हकदार बनते हैं और पुरस्कार स्वरूप न जाने क्या क्या जीत ले जाते हैं, किंतु कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जो जीवन के सैकड़ों तरह के  झंझावात -अभाव - अपूर्णता- एकाकीपन  जैसे तमाम पतझड़ अपने सीने में  सकुशल दफ्न करने के बाद अभिनय करते हैं "खुश रहने का" किंतु उनके अभिनय की  कोई प्रशंसा नहीं होती जबकि वो इतने  कुशल अभिनेता होते हैं कि एक उम्र बीत जाने तक दर्शकों को एहसास नहीं  होने देते कि वो खुशनुमा हकीकत, हकीक़त नहीं बल्कि एक अभिनय मात्र था ।

खत

 तेरी खुशबू में  लिपटे हुए कुछ खत गदगद हुए जाते हैं रखे हुए दराज में, तेरी ख़ामोशी में  बिखरे हुए लिहाफ अब भी सिसकते हैं घर के किसी कोने में चुप सी आवाज़ में, तेरे मखमूर से  बदन की मादक मुश्क लिए मेरी कमीज़ अब भी टंगी है किंवाड़ के पीछे, तेरे लरज़ते हुए सुर्ख होंठो का एहसास लिए हुए एक तौलिया अब भी गुमान करता है अपने हुसूल-ओ-कामरानी पे, तेरे गेसुओं का स्याह संदलापन लिए वो तकिए खूब गुरुर करते हैं तेरे बदन के छुअन की कामयाबी पर, हमारे लम्स की मदमस्त आहों की  गवाह दीवारें खुद को कमजर्फ कहते हुए तुझे ढूंढती हैं ऐसे दौर - ए -खलवत में मेरे फजूल चुटकुलों पे  तेरे कहकहों की आवाज लिए क्या क्या बाते गढ़ते हैं घर के कमरे सारे, और तेरी कुरबतों की उल्फतों का अथाह दरिया लिए खुदी बहती रहती है किसी बवंडर में.......!!

मायूस कोयल

 अब कौन समझाए बारामदे के खूंटे पे उदास और अकेलापन  महसूस करते हुए बैठी उस कोयल को कि वो बचपन भारी बस्तों  और आगे बढ़ने की होड़ के बोझ तले दबकर गुम हो गया है, वो बचपन जो कभी उसकी मीठी सी आवाज़ की नकल कर के  घंटों उसके साथ  खिलवाड़ किया करता था, वो बचपन जो ज्येष्ठ की भीषण तपती हुई दोपहर में लूक और लपट के बीच भी समय निकालकर उसके लिए  टूटे हुए मटके के खपरैल में पानी भर कर रखता था, वो बचपन जो नया बस्ता न मिलने पर नाराज़ होकर उसके घोंसले वाले पेड़ की निमौली को उठाकर अनजान गंतव्य में फेंकते हुए अपने आंसू भूल जाया करता था, वो बचपन जो मां से तमाम मिन्नतों  के बाद बनवाई हुई चीनी वाली रोटी के दो चार छोटे छोटे टुकड़े उसके लिए बचाकर रखता था, वो बचपन जिसे तेरे घोंसले के नन्हें मुन्नो की फिकर और  उनके आने का उत्साह दुनिया में सबसे  ज्यादा हुआ करता था, अब कौन समझाए उसे कि जी बचपन  जो उसकी खातिर गिलहरियों  और चीलों से लड़ता था वो बचपन मोबाइल के मायाजाल और प्रतिस्पर्धा के प्रगतिशाली अंधकार में  सदा के लिए सो सा गया है......!!

विरह

 विरह कभी भी वास्तविक नहीं हो सका, हालांकि शारीरिक विच्छेद हुआ है किन्तु मानसिक एकाकीपन न ला सका, क्योंकि कितने ही प्रेमियों ने जिया है प्रेमिका के सान्निध्य को अपनी कल्पनाओं में उसके चले जाने के पश्चात भी, कितने ही प्रेमियों ने उकेरा है प्रेमिका संग प्रगाढ़ आलिंगन को अपने ख्यालों के कैनवास पर, और कितने ही प्रेमियों ने चखे हैं अधरों के  कोमल कंपोल स्पर्श को प्रेमिका की धुंधली पुरानी तस्वीरों में, कितने प्रेमी तो सर्द रातों में महसूस कर लेते हैं बदन की गर्मी को भींच कर तकिया अपनी बाजुओं में प्रेमिका की मानिंद, कितने प्रेमियों ने स्वप्न में महसूस किया है माशूक के गीले गेसुओं को अपने गालों पर, और  कितने प्रेमी आनंदित हुए हैं महसूस कर के प्रेमिका का हांथ दुःख की घड़ी में अपने  बेतरतीब उलझे बालों पर......!!

हर हर महादेव

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  वो जिसके केश में हो गंग  और हो वेश एक निहंग सा वो जिसका रूप हो अनंग  और हो मन किसी विहंग सा..... वो जिसके कंठ में हो विष और ग्रीव-माल एक भुजंग सा हो गण में जिसके भूत - प्रेत मग़र स्नेह वाणी में सत्संग सा..... वो जिसके हस्त में त्रिशूल हो और क्रोध का उबाल हो हो सक्त भी, आसक्त भी किन्तु स्वरूप हो पावन उमंग सा..... वो जिसकी शक्ति का न अंत हो पर हो दंभ से विरक्त सा जो ख़ुद में सर्वकार हो  दर्श में आनंद एक तरंग सा..... चर भी वो, है अचर भी वो है नारी भी वो और नर भी वो, वही सूक्ष्म है, वही तनु भी है वही पशुपति, परमेश्वर भी वो..... वो जो काल का भी काल हो हो छद्म फिर भी विकराल हो मद भी हो महेश्वर भी हो  किन्तु भान सर्वकाल हो..... वो देव हो, महादेव हो समस्त सृष्टि का वो जैव हो वो निशि भी हो, हो रैन भी किन्तु कल्याण हो सर्वस्व का..... जो रक्त का पिपासु भी और जीवन का वो जिज्ञासु भी  वो श्वास भी , वो मृत्यु भी शकल सृष्टि का अविनाशी भी..... हो वृषभ जिसका वाहन और पिशाच जिसके भ्रत्य हों जो चर-अचर हो ख़ुद में ही भ्रषंश ताण्डव जिसका नृत्य हो...... वही भूत है, भविष्य है वही ...