मायूस कोयल

 अब कौन समझाए

बारामदे के खूंटे पे

उदास और अकेलापन 

महसूस करते हुए बैठी

उस कोयल को


कि

वो बचपन

भारी बस्तों 

और

आगे बढ़ने की होड़

के बोझ तले दबकर

गुम हो गया है,


वो बचपन

जो कभी

उसकी मीठी सी आवाज़ की

नकल कर के 

घंटों उसके साथ 

खिलवाड़ किया करता था,


वो बचपन जो

ज्येष्ठ की भीषण

तपती हुई दोपहर में

लूक और लपट के बीच भी

समय निकालकर

उसके लिए 

टूटे हुए मटके

के खपरैल में

पानी भर कर रखता था,


वो बचपन

जो नया बस्ता न मिलने पर

नाराज़ होकर

उसके घोंसले वाले

पेड़ की निमौली को

उठाकर अनजान

गंतव्य में

फेंकते हुए अपने

आंसू भूल जाया करता था,


वो बचपन

जो मां से तमाम मिन्नतों 

के बाद

बनवाई हुई

चीनी वाली रोटी के

दो चार छोटे छोटे टुकड़े

उसके लिए बचाकर रखता था,


वो बचपन

जिसे तेरे घोंसले के

नन्हें मुन्नो की फिकर

और 

उनके आने का उत्साह

दुनिया में सबसे 

ज्यादा हुआ करता था,


अब कौन समझाए उसे

कि जी बचपन 

जो उसकी खातिर

गिलहरियों 

और चीलों से लड़ता था

वो बचपन

मोबाइल के मायाजाल

और

प्रतिस्पर्धा के प्रगतिशाली

अंधकार में

 सदा के लिए सो सा गया है......!!

Comments

Popular posts from this blog

मैं चाहता हूं......!!

हर हर महादेव

देवों के देव महादेव