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Showing posts from January, 2026

अभिनय या हकीकत

 कुछ लोग रंगमंच पर करते हैं अभिनय और बखूबी उकेर कर  रख देते हैं  दुनिया भर के तमाम  दुःख-दर्द-द्वेष-खुशी-करुणा-प्रेम और न जाने कितने ही अन्य भावों को प्रशंसा के हकदार बनते हैं और पुरस्कार स्वरूप न जाने क्या क्या जीत ले जाते हैं, किंतु कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जो जीवन के सैकड़ों तरह के  झंझावात -अभाव - अपूर्णता- एकाकीपन  जैसे तमाम पतझड़ अपने सीने में  सकुशल दफ्न करने के बाद अभिनय करते हैं "खुश रहने का" किंतु उनके अभिनय की  कोई प्रशंसा नहीं होती जबकि वो इतने  कुशल अभिनेता होते हैं कि एक उम्र बीत जाने तक दर्शकों को एहसास नहीं  होने देते कि वो खुशनुमा हकीकत, हकीक़त नहीं बल्कि एक अभिनय मात्र था ।

खत

 तेरी खुशबू में  लिपटे हुए कुछ खत गदगद हुए जाते हैं रखे हुए दराज में, तेरी ख़ामोशी में  बिखरे हुए लिहाफ अब भी सिसकते हैं घर के किसी कोने में चुप सी आवाज़ में, तेरे मखमूर से  बदन की मादक मुश्क लिए मेरी कमीज़ अब भी टंगी है किंवाड़ के पीछे, तेरे लरज़ते हुए सुर्ख होंठो का एहसास लिए हुए एक तौलिया अब भी गुमान करता है अपने हुसूल-ओ-कामरानी पे, तेरे गेसुओं का स्याह संदलापन लिए वो तकिए खूब गुरुर करते हैं तेरे बदन के छुअन की कामयाबी पर, हमारे लम्स की मदमस्त आहों की  गवाह दीवारें खुद को कमजर्फ कहते हुए तुझे ढूंढती हैं ऐसे दौर - ए -खलवत में मेरे फजूल चुटकुलों पे  तेरे कहकहों की आवाज लिए क्या क्या बाते गढ़ते हैं घर के कमरे सारे, और तेरी कुरबतों की उल्फतों का अथाह दरिया लिए खुदी बहती रहती है किसी बवंडर में.......!!

मायूस कोयल

 अब कौन समझाए बारामदे के खूंटे पे उदास और अकेलापन  महसूस करते हुए बैठी उस कोयल को कि वो बचपन भारी बस्तों  और आगे बढ़ने की होड़ के बोझ तले दबकर गुम हो गया है, वो बचपन जो कभी उसकी मीठी सी आवाज़ की नकल कर के  घंटों उसके साथ  खिलवाड़ किया करता था, वो बचपन जो ज्येष्ठ की भीषण तपती हुई दोपहर में लूक और लपट के बीच भी समय निकालकर उसके लिए  टूटे हुए मटके के खपरैल में पानी भर कर रखता था, वो बचपन जो नया बस्ता न मिलने पर नाराज़ होकर उसके घोंसले वाले पेड़ की निमौली को उठाकर अनजान गंतव्य में फेंकते हुए अपने आंसू भूल जाया करता था, वो बचपन जो मां से तमाम मिन्नतों  के बाद बनवाई हुई चीनी वाली रोटी के दो चार छोटे छोटे टुकड़े उसके लिए बचाकर रखता था, वो बचपन जिसे तेरे घोंसले के नन्हें मुन्नो की फिकर और  उनके आने का उत्साह दुनिया में सबसे  ज्यादा हुआ करता था, अब कौन समझाए उसे कि जी बचपन  जो उसकी खातिर गिलहरियों  और चीलों से लड़ता था वो बचपन मोबाइल के मायाजाल और प्रतिस्पर्धा के प्रगतिशाली अंधकार में  सदा के लिए सो सा गया है......!!

विरह

 विरह कभी भी वास्तविक नहीं हो सका, हालांकि शारीरिक विच्छेद हुआ है किन्तु मानसिक एकाकीपन न ला सका, क्योंकि कितने ही प्रेमियों ने जिया है प्रेमिका के सान्निध्य को अपनी कल्पनाओं में उसके चले जाने के पश्चात भी, कितने ही प्रेमियों ने उकेरा है प्रेमिका संग प्रगाढ़ आलिंगन को अपने ख्यालों के कैनवास पर, और कितने ही प्रेमियों ने चखे हैं अधरों के  कोमल कंपोल स्पर्श को प्रेमिका की धुंधली पुरानी तस्वीरों में, कितने प्रेमी तो सर्द रातों में महसूस कर लेते हैं बदन की गर्मी को भींच कर तकिया अपनी बाजुओं में प्रेमिका की मानिंद, कितने प्रेमियों ने स्वप्न में महसूस किया है माशूक के गीले गेसुओं को अपने गालों पर, और  कितने प्रेमी आनंदित हुए हैं महसूस कर के प्रेमिका का हांथ दुःख की घड़ी में अपने  बेतरतीब उलझे बालों पर......!!