मेरे जज्बात
आवारा एहसास
परिन्दों सी ख्वाहिशें,
ज़िन्दगी का तजुर्बा,
कुछ मेरी - कुछ तुम्हारी
कुछ यहाँ की - कुछ वहाँ की
कभी इसकी - कभी उसकी
न जाने किस-किस की।
हे दीनों के दाता ओ भाग्य विधाता तुम ही हो सुखरासी जो तू न चाहे तो साँस भी अन्दर डग न भरे रुक जाये कंपन ह्रदय का जीवन आगे पग न धरे तेरी ही करुणा के सागर में हम जीवित हैं हे अविनाशी तेरे ही चक्षु हैं जिसमें है सारी श्रष्टि बसी तेरे ही कण्ठ में विष मंथन का सारा व्याप्त है हे देवों के देव तुम महादेव तुम हो कण-कण के वासी तू जो न होता तो मिट जाती ये धरती सारी हो कोई भी काल तू बन विकराल है सब पे भारी ने नागों के धारी हर दानव पे भारी तुम हो घट-घट के वासी तुमने ही धारा है गंगा को अपनी जटाओं में तुमने ही मान दिया है चाँद को अपनी मस्तक-लताओं में तुम पर है निर्भर इस जग का हर एक वासी तुम नाथ हो अनाथ के, ओ कैलाशी
मैं चाहता हूं कि तुम अपना हल्का गुलाबी वाला सूट पहनकर उस कच्चे रास्ते से होती हुई नीचे उतरो जो तुम्हारे घर के पीछे वाली फुलवारी को छूता हुआ गुजरता है और साथ लगे चटख पीली चादर जैसे पसरे हुए सूरजमुखी के खेतों के किनारे से होता हुआ गांव की कच्ची सड़क तक जाता है मैं चाहता हूं तुम वहां पहुंचो और मेंड़ के किनारे खड़ी होकर मेरा इंतजार करो...... मैं हल्की भूरी कमीज़ जो कि गांव के ही दर्जी ने सीं होगी और सफ़ेद सूती धोती पहने हुए अपनी काली साइकिल से तुम्हें लेने आऊं.... और तुमको साइकिल में आगे की तरफ़ बैठाकर वहां से कुछ डेढ़ कोस की दूरी पर हमारे अंबिया के बगिया में ले जाऊँ जहां हाल ही में डेरा डाल चुके बसंत राज ने ताज़े बौर की खुशबू से हवाओं को मदमस्त महका रखा होगा.... वहां की मखमली हरी घास पे बैठकर मैं देर तलक, अपलक, एक टक तुम्हें निहारता जाऊं, और तुम कितनी खूबसूरत हो इस कल्पना में कहीं खो सा जाऊं, कभी तुम अपनी गिरती लट को संभालो तो कभी थोड़ा शर्मा कर अपनी गोरी हथेलियों से ख़ुद का चेहरा छुपा लो कभी अपने गिरते दुपट्टे को वापस उठाकर कांधे पे रखो तो कभी मुझ पर पूर्ण विश...
••••••••••••••••••••••••••••••••••••••• मेरी ज़रूरतों पर ज़रा नीयत-ए-हलाल रखा करो, कि बेशकीमती हो तुम मेरी जां, तुम अपना ख्याल रखा करो.......१ न जेहन में कोई शिकवा न निगाह में कोई सवाल रखा करो, कि मेरी अमानत हो तुम मेरी जां, तुम अपना ख़्याल रखा करो.......२ अपने लब पे मेरा नाम और मेरे होंठों पे अपना ज़माल रखा करो, कि मेरी मोहब्बत हो तुम मेरी जां, तुम अपना ख़्याल रखा करो.......३ हमारे रब्त में इफ्फत और ज़हन में आज़-ए-विसाल रखा करो, कि मेरी इबादत हो तुम मेरी जां, तुम अपना ख़्याल रखा करो........४ अपने होंठों पर नाज़नीन हँसी और ज़हन को खुश- हाल रखा करो, कि मेरी हसरत हो तुम मेरी जां, तुम अपना ख़्याल रखा करो........५ मेरे हांथो में हांथ अपने और अब्स में अपने ग़ज़ाल रखा करो, कि मेरी उल्फ़त हो तुम मेरी जां, तुम अपना ख़्याल रखा करो.......६ •••••••••••••••••••••••••••••••••••••••
Comments
Post a Comment