3 यूं तो हर सिफ्त काबिल-ए-तौसीफ़ है मेरे क़िरदार में, मगर मुझको जो मोहब्बत मेरी आवारगी से है वो बात किसी और में नहीं.....!! 4 हर एक आहट पे तुम आओ ये मुमकिन तो नहीं, मगर हर एक आहट पे तुम आए हो ऐसा लगता है मुझे.....!! 5 बहुत शर्मिन्दा किया फिर हमको तेरी आदत ने ओ जाना, वो तेरे बाद जिस तरह हम अपनी आंखो में तेरा अक्स ले के घूमे हैं....!!
Posts
अभिनय या हकीकत
- Get link
- X
- Other Apps
कुछ लोग रंगमंच पर करते हैं अभिनय और बखूबी उकेर कर रख देते हैं दुनिया भर के तमाम दुःख-दर्द-द्वेष-खुशी-करुणा-प्रेम और न जाने कितने ही अन्य भावों को प्रशंसा के हकदार बनते हैं और पुरस्कार स्वरूप न जाने क्या क्या जीत ले जाते हैं, किंतु कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जो जीवन के सैकड़ों तरह के झंझावात -अभाव - अपूर्णता- एकाकीपन जैसे तमाम पतझड़ अपने सीने में सकुशल दफ्न करने के बाद अभिनय करते हैं "खुश रहने का" किंतु उनके अभिनय की कोई प्रशंसा नहीं होती जबकि वो इतने कुशल अभिनेता होते हैं कि एक उम्र बीत जाने तक दर्शकों को एहसास नहीं होने देते कि वो खुशनुमा हकीकत, हकीक़त नहीं बल्कि एक अभिनय मात्र था ।
खत
- Get link
- X
- Other Apps
तेरी खुशबू में लिपटे हुए कुछ खत गदगद हुए जाते हैं रखे हुए दराज में, तेरी ख़ामोशी में बिखरे हुए लिहाफ अब भी सिसकते हैं घर के किसी कोने में चुप सी आवाज़ में, तेरे मखमूर से बदन की मादक मुश्क लिए मेरी कमीज़ अब भी टंगी है किंवाड़ के पीछे, तेरे लरज़ते हुए सुर्ख होंठो का एहसास लिए हुए एक तौलिया अब भी गुमान करता है अपने हुसूल-ओ-कामरानी पे, तेरे गेसुओं का स्याह संदलापन लिए वो तकिए खूब गुरुर करते हैं तेरे बदन के छुअन की कामयाबी पर, हमारे लम्स की मदमस्त आहों की गवाह दीवारें खुद को कमजर्फ कहते हुए तुझे ढूंढती हैं ऐसे दौर - ए -खलवत में मेरे फजूल चुटकुलों पे तेरे कहकहों की आवाज लिए क्या क्या बाते गढ़ते हैं घर के कमरे सारे, और तेरी कुरबतों की उल्फतों का अथाह दरिया लिए खुदी बहती रहती है किसी बवंडर में.......!!
मायूस कोयल
- Get link
- X
- Other Apps
अब कौन समझाए बारामदे के खूंटे पे उदास और अकेलापन महसूस करते हुए बैठी उस कोयल को कि वो बचपन भारी बस्तों और आगे बढ़ने की होड़ के बोझ तले दबकर गुम हो गया है, वो बचपन जो कभी उसकी मीठी सी आवाज़ की नकल कर के घंटों उसके साथ खिलवाड़ किया करता था, वो बचपन जो ज्येष्ठ की भीषण तपती हुई दोपहर में लूक और लपट के बीच भी समय निकालकर उसके लिए टूटे हुए मटके के खपरैल में पानी भर कर रखता था, वो बचपन जो नया बस्ता न मिलने पर नाराज़ होकर उसके घोंसले वाले पेड़ की निमौली को उठाकर अनजान गंतव्य में फेंकते हुए अपने आंसू भूल जाया करता था, वो बचपन जो मां से तमाम मिन्नतों के बाद बनवाई हुई चीनी वाली रोटी के दो चार छोटे छोटे टुकड़े उसके लिए बचाकर रखता था, वो बचपन जिसे तेरे घोंसले के नन्हें मुन्नो की फिकर और उनके आने का उत्साह दुनिया में सबसे ज्यादा हुआ करता था, अब कौन समझाए उसे कि जी बचपन जो उसकी खातिर गिलहरियों और चीलों से लड़ता था वो बचपन मोबाइल के मायाजाल और प्रतिस्पर्धा के प्रगतिशाली अंधकार में सदा के लिए सो सा गया है......!!
विरह
- Get link
- X
- Other Apps
विरह कभी भी वास्तविक नहीं हो सका, हालांकि शारीरिक विच्छेद हुआ है किन्तु मानसिक एकाकीपन न ला सका, क्योंकि कितने ही प्रेमियों ने जिया है प्रेमिका के सान्निध्य को अपनी कल्पनाओं में उसके चले जाने के पश्चात भी, कितने ही प्रेमियों ने उकेरा है प्रेमिका संग प्रगाढ़ आलिंगन को अपने ख्यालों के कैनवास पर, और कितने ही प्रेमियों ने चखे हैं अधरों के कोमल कंपोल स्पर्श को प्रेमिका की धुंधली पुरानी तस्वीरों में, कितने प्रेमी तो सर्द रातों में महसूस कर लेते हैं बदन की गर्मी को भींच कर तकिया अपनी बाजुओं में प्रेमिका की मानिंद, कितने प्रेमियों ने स्वप्न में महसूस किया है माशूक के गीले गेसुओं को अपने गालों पर, और कितने प्रेमी आनंदित हुए हैं महसूस कर के प्रेमिका का हांथ दुःख की घड़ी में अपने बेतरतीब उलझे बालों पर......!!
हर हर महादेव
- Get link
- X
- Other Apps
वो जिसके केश में हो गंग और हो वेश एक निहंग सा वो जिसका रूप हो अनंग और हो मन किसी विहंग सा..... वो जिसके कंठ में हो विष और ग्रीव-माल एक भुजंग सा हो गण में जिसके भूत - प्रेत मग़र स्नेह वाणी में सत्संग सा..... वो जिसके हस्त में त्रिशूल हो और क्रोध का उबाल हो हो सक्त भी, आसक्त भी किन्तु स्वरूप हो पावन उमंग सा..... वो जिसकी शक्ति का न अंत हो पर हो दंभ से विरक्त सा जो ख़ुद में सर्वकार हो दर्श में आनंद एक तरंग सा..... चर भी वो, है अचर भी वो है नारी भी वो और नर भी वो, वही सूक्ष्म है, वही तनु भी है वही पशुपति, परमेश्वर भी वो..... वो जो काल का भी काल हो हो छद्म फिर भी विकराल हो मद भी हो महेश्वर भी हो किन्तु भान सर्वकाल हो..... वो देव हो, महादेव हो समस्त सृष्टि का वो जैव हो वो निशि भी हो, हो रैन भी किन्तु कल्याण हो सर्वस्व का..... जो रक्त का पिपासु भी और जीवन का वो जिज्ञासु भी वो श्वास भी , वो मृत्यु भी शकल सृष्टि का अविनाशी भी..... हो वृषभ जिसका वाहन और पिशाच जिसके भ्रत्य हों जो चर-अचर हो ख़ुद में ही भ्रषंश ताण्डव जिसका नृत्य हो...... वही भूत है, भविष्य है वही ...
मैं चाहता हूं......!!
- Get link
- X
- Other Apps
मैं चाहता हूं कि तुम अपना हल्का गुलाबी वाला सूट पहनकर उस कच्चे रास्ते से होती हुई नीचे उतरो जो तुम्हारे घर के पीछे वाली फुलवारी को छूता हुआ गुजरता है और साथ लगे चटख पीली चादर जैसे पसरे हुए सूरजमुखी के खेतों के किनारे से होता हुआ गांव की कच्ची सड़क तक जाता है मैं चाहता हूं तुम वहां पहुंचो और मेंड़ के किनारे खड़ी होकर मेरा इंतजार करो...... मैं हल्की भूरी कमीज़ जो कि गांव के ही दर्जी ने सीं होगी और सफ़ेद सूती धोती पहने हुए अपनी काली साइकिल से तुम्हें लेने आऊं.... और तुमको साइकिल में आगे की तरफ़ बैठाकर वहां से कुछ डेढ़ कोस की दूरी पर हमारे अंबिया के बगिया में ले जाऊँ जहां हाल ही में डेरा डाल चुके बसंत राज ने ताज़े बौर की खुशबू से हवाओं को मदमस्त महका रखा होगा.... वहां की मखमली हरी घास पे बैठकर मैं देर तलक, अपलक, एक टक तुम्हें निहारता जाऊं, और तुम कितनी खूबसूरत हो इस कल्पना में कहीं खो सा जाऊं, कभी तुम अपनी गिरती लट को संभालो तो कभी थोड़ा शर्मा कर अपनी गोरी हथेलियों से ख़ुद का चेहरा छुपा लो कभी अपने गिरते दुपट्टे को वापस उठाकर कांधे पे रखो तो कभी मुझ पर पूर्ण विश...
तेरी खुशबू में लिपटे हुए खत
- Get link
- X
- Other Apps
तेरी खुशबू में लिपटे हुए कुछ खत गदगद हुए जाते हैं रखे हुए दराज में, तेरी ख़ामोशी में बिखरे हुए लिहाफ अब भी सिसकते हैं घर के किसी कोने में चुप सी आवाज़ में, तेरे मखमूर से बदन की मादक मुश्क लिए मेरी कमीज़ अब भी टंगी है किंवाड़ के पीछे, तेरे लरज़ते हुए सुर्ख होंठो का एहसास लिए हुए एक तौलिया अब भी गुमान करता है अपने हुसूल-ओ-कामरानी पे, तेरे गेसुओं का स्याह संदलापन लिए वो तकिए खूब गुरुर करते हैं तेरे बदन के छुअन की कामयाबी पर, हमारे लम्स की मदमस्त आहों की गवाह दीवारें खुद को कमजर्फ कहते हुए तुझे ढूंढती हैं ऐसे दौर - ए -खलवत में मेरे फजूल चुटकुलों पे तेरे कहकहों की आवाज लिए क्या क्या बाते गढ़ते हैं घर के कमरे सारे, और तेरी कुरबतों की उल्फतों का अथाह दरिया लिए खुदी बहती रहती है किसी बवंडर में.......!!
देवों के देव महादेव
- Get link
- X
- Other Apps
वो ज्ञान है, अज्ञान है वही जड़-चेतन, महापुराण है, वो राग है, वो गान है वो स्वरमयी भगवान है, वो काल है, विकराल है शितिकण्ठ वो, वही महाकाल है, वो सूक्ष्म है, विशाल है वही आज, वही अनंतकाल है, जीवन भी वो, है मृत्यु भी वही अनन्त है, सर्वज्ञ भी, भय भी वो, अभय भी वो है विश्वेश्वर, यज्ञमय भी वो, वो अस्त्र है, वही शस्त्र है वही स्वरमयी, परशुहस्त है, वो सक्त है, आसक्त है वही त्रिपुरान्तक, पंचवक्त्र है वो प्राण है, पाषाण है वही शाश्वत, स्थाणु है, जय भी वो, विजय भी वो है व्योमकेश, मृत्युंजय भी वो, उत्पत्ति है, अवरोध है हर शक्ति का वही बोध है, प्रमाण है, प्रत्यक्ष है वही वामदेव, विरुपाक्ष है, वो अंत है, आरम्भ है वही अपवर्गप्रद, प्रारम्भ है, वो शूल है, वो पाणी है वो शामप्रिय, मृगपाणी है, वो भद्र है, अभद्र है वही गिरिश्वर वीरभद्र है, वो श्रष्टि है, वो दृष्टि है वही भगनेत्रविद, गंगवृष्टि है, सुघड़ भी वो, अवघड़ भी वो वही दुर्धुर्ष, व्रषभारूढ़ भी है, वो शान्त है, वो उग्र है वही दक्षाध्वरहर, अव्यग्र है, वो प्रेम है, वही पाश है वही शिवाप्रिय सर्व -श्वास है, शिव भी वो, शंकर भी वो है दिगंब...
आवारगी
- Get link
- X
- Other Apps
१ ये दायरे, ये बंदिशें किसी और पर थोपो मैं हवा का झोंका हूं मुझे आवारगी पसंद है.....!! २ इश्क -ओ -ऐतबार की बंदिशों में बंधकर रहना नहीं आता, मैं आवारा हवा हूं फजाओं की मुझको कहीं ठहरना नहीं आता.......!! ३ किसी को दौलत में किसी को शोहरत में तो किसी को बंदगी में मजा आता है, मैं बंजारा मजाज़ हूं, साहब मुझको बस आवारगी में मजा आता है......!! ४ खैरात में नहीं मिली मुझको ये मुफलिसी ये आवारगी, ये बेबाक लहज़ा, बहुत मशक्कत की है मैने खुद को इतना बरबाद करने के लिए.......!! ५ बहुत मुतासिर है तेरे हुकूक से वजूद मेरा, ऐ हवाओं मुझको इल्म दो तमाम बंदिशें मिटाने का......!!
वो दोस्त......
- Get link
- X
- Other Apps
जो स्कूल में सँग-सँग मार खाये.... वो दोस्त जो क्लास में बेवज़ह हँसाये.... वो दोस्त आपके होमवर्क न कर लेन पे जो अपना भी होमवर्क न दिखाये..... वो दोस्त जो लंचबॉक्स चलती क्लास में खाये ..... वो दोस्त जो आपकी हर क्रश को अपनी भाभी बनाये.... वो दोस्त जो ख़ुद सिंगल रहकर लड़की पटाने के नुस्ख़े बताये..... वो दोस्त जो मार खाकर भी आपके साथ मुस्कुराये..... वो दोस्त जो नशा बुरी चीज है ये बात बताये..... वो दोस्त जो पहली सिगरेट आपके हाँथो में पकड़ाये..... वो दोस्त जो बीयर पीने के तरीके सिखाये..... वो दोस्त जो धुत्त नशे में होने पर भी दारू का पेग बनाये.... वो दोस्त रात को बारह बजे के बाद नशे में मैगी बनाये.... वो दोस्त बैठे-बैठे अचानक पहाड़ों पर जाने का प्लान बनाये.... वो दोस्त जो आपकी ख़ातिर कितनों से भी भिड़ जाये..... वो दोस्त रात को धुत्त होकर गर्लफ्रेंड की गली में जाने की गरारी अटकाये..... वो दोस्त सुबह उठते ही ठेके पहुँच जाये..... वो दोस्त कड़की में भी जिसकी जेब से 500का नोट निकल आये..... वो दोस्त सारे ऐब में साथ दे मग़र मुँह भी बनाये.... वो दोस्त शरीफ़ों का चेहरा लेकर सबसे हरामी प्लान बनाये.... वो दोस...
ओ कैलाशी
- Get link
- X
- Other Apps
हे दीनों के दाता ओ भाग्य विधाता तुम ही हो सुखरासी जो तू न चाहे तो साँस भी अन्दर डग न भरे रुक जाये कंपन ह्रदय का जीवन आगे पग न धरे तेरी ही करुणा के सागर में हम जीवित हैं हे अविनाशी तेरे ही चक्षु हैं जिसमें है सारी श्रष्टि बसी तेरे ही कण्ठ में विष मंथन का सारा व्याप्त है हे देवों के देव तुम महादेव तुम हो कण-कण के वासी तू जो न होता तो मिट जाती ये धरती सारी हो कोई भी काल तू बन विकराल है सब पे भारी ने नागों के धारी हर दानव पे भारी तुम हो घट-घट के वासी तुमने ही धारा है गंगा को अपनी जटाओं में तुमने ही मान दिया है चाँद को अपनी मस्तक-लताओं में तुम पर है निर्भर इस जग का हर एक वासी तुम नाथ हो अनाथ के, ओ कैलाशी
मैं ही ओंकार हूँ......!!
- Get link
- X
- Other Apps
मैं शूर हूँ मैं वीर हूँ मैं साहसों का धीर हूँ मैं वक़्त की पुकार हूँ हां... मैं ओंकार हूँ............१ मैं सत्य से डिगूँ नहीँ वैरी को भी छलूँ नहीँ, हर युद्ध का मैं सार हूँ हां... मैं ओंकार हूँ.............२ मैं द्वन्द में विजयी हूँ हर पाश में अजेय हूँ मैं शक्ति का आकार हूँ हां... मैं ओंकार हूँ............३ मैं आग से जलूँ नहीँ मैं शस्त्र से कटू नहीँ हर विघ्न का अंधकार हूँ हां... मैं ओंकार हूँ...........४ कोई मोह-पाश है नहीँ कोई द्वेष-भाव है नहीँ मैं ऊर्जा का संचार हूँ हां... मैं ओंकार हूँ...........५ कोई भय मुझे लगे नहीँ कोई क्षय मुझे छुये नहीँ मैं विकार का विकार हूँ हां... मैं ओंकार हूँ............६ मैं पाप पर नकेल हूँ निष्पाप का मैं खेल हूँ मैं सिंह की दहाड़ हूँ हां... मैं ओंकार हूँ............७ मैं पापियों का नाश हूँ हर पुण्य की मैं आस हूँ मैं श्रष्टि का संहार हूँ हां... मैं ओंकार हूँ............८ मैं राग हूँ - विराग हूँ दहकती एक आग हूँ मैं खुद में सर्वकार हूँ हां... मैं ओंकार हूँ.............९ मैं ज्ञान हूँ विज्ञान हूँ मैं वेद और पुराण...
अँधेरी होती जा रही है दीपावली.......!!
- Get link
- X
- Other Apps
दीपावली कहें या दीवाली कोई फर्क नहीँ पड़ता, फर्क पड़ता है तो इसको मनाने के तरीके से। आज के समाज में हर त्योहार का स्वरूप इतना बदल चुका है कि वो त्यौहार अपनी असली छाप लगभग खो चुका है। मेरे ख़्याल से दीपावली दीपकों व दीयों का त्योहार है न कि विदेशी झालरों, लड़ियों व एलेक्ट्रोनिक रँग-बिरंगे बल्ब्स का, लेकिन अधुनिकता व सम्पन्नता के दिखावे की होड़ में हम ये सब भूल चुके हैं। हम भूल चुके हैं कि इस होड़ में हमने रोशनी के त्योहार से रोशनी ही मिटा दी है - " बुझ रहे हैं हक़ीक़तों के दिये रोशनी खोती जा रही है दिवाली, बढ़ रहे हैं दिखावट के ताने-बाने औरअंधी होती जा रही है रौशनी......!!" हम भूल चुके हैं कि हमारे पूर्वज लाखो-करोड़ों वर्षों से ये त्योहार सिर्फ नेचुरल तेल व मिट्टी के दीपको के खूबसूरत सफर के साथ मनाते आये हैँ। हमें चाहिये कि हम दूसरों का साथ न देकर अपने देश व देशवासियों का साथ दें, विदेशियों को रोजगार व धन की मदद न कर के अपने देशवासियों के लिये रोजगार व आमदनी बढ़ाएं अर्थात विदेशी को त्याग कर स्वदेशी अपनायें। कुछ लोग तो ऐसे भी हैँ की जिन्हें खुद को ये झालर व लड़ियाँ ...
मैं महादेव हो जाना चाहता हूँ......!!
- Get link
- X
- Other Apps
कड़ी तपस्या में लीन हो मैं वो शक्ति पाना चाहता हूँ, खोल कर तीसरी आँख सारी दुनिया को मिटाना चाहता हूँ, मैं महादेव हो जाना चाहता हूँ.....१ ये धर्म के टण्टे ये जातियों का घटियापन, मानसिक मलीनता और सोच का छिछलापन, ये सारी की सारी बुराइयां मिटाना चाहता हूँ मैं महादेव हो जाना चाहता हूँ.....२ ये सत्ता का मद ये विरोध का घिनौनापन, ये ताकत का घमण्ड और पदवी का विषैलापन, ये सारी की सारी दास्ताँ भुलाना चाहता हूँ मैं महादेव हो जाना चाहता हूँ....३ ये अमीरों का रवैया गरीबों का शोषण, ये भूखी तड़पती गरीबी और बच्चों का कुपोषण, ये घटिया दृश्य मैं बिल्कुल भुलाना चाहता हूं मैं महादेव हो जाना चाहता हूँ.....४ ये झुठी सी भक्ति और हिंसा का प्रहार, ये कुटिल सी संस्क्रति और विक्षिप्त संस्कार, ये सारे के सारे मैं जड़ से मिटाना चाहता हूँ मैं महादेव हो जाना चाहता हूँ....५ ये जलती हुयी आत्मायें और गिद्धों से नुचती हुयी लाशें, ये भूख से बिलखता बचपन और नशे में धुत्त बाप की फ़रमाइशें, मैं इन चीखते मंजरों का एक अंत पाना चाहता हूँ मैं महादेव हो जाना चाहता हूँ.......६ ...
नन्हीं चिड़िया की याद सताती है
- Get link
- X
- Other Apps
गर्मी के मौसम में जब-जब शहर की तीखी धूप मुझे अखरती है, सड़कों से उगलती गर्मी और पक्के कमरों की दीवार भभकती है, तब गर्म छतों पर रहने वाली उस नन्हीं चिड़िया की याद सताती है...........१ चिलचिलाती धूप की चादर मेरे सर को जब छू कर जाती है, गर्म हवा, लू और लपट के थपेड़ो से रँगत मुरझा जाती है, तब पल भर की छाँव को तरसने वाली उस नन्हीं चिड़िया की याद सताती है............२ जब पी-पी क़र पानी दिन भर भी प्यास नहीँ बुझ पाती है, कदम-दो-कदम चलते ही मिट्टी में सारी ताक़त मिल जाती है, तब बूँद-बूँद को तरसने वाली उस नन्हीं चिड़िया की याद आती है..........३ जब कड़क धूप की किरणें मेरे बदन को सहला जाती हैँ, मन पागल सा हो जाता है मानो सारी खुशियाँ पिघल जाती हैं, तब गर्म आसमाँ में उड़ने वाली उस नन्हीं चिड़िया की याद सताती है.........४ गर्म हवा के अन्धड़ से गुजर कोई अपना जब घर को आता है, देख के कुम्हलाया हुआ चेहरा दिल मौसम को कितनी दुत्कार लगाता है, ऐसे में कोमल पँखो वाली उस नन्हीं चिड़िया की याद सताती है.........५ गर्मी को दोपहरों में जब बाहर निकलना पड़ जाता है, दिल चीखें कितनी ...
मैं आवारा हूँ
- Get link
- X
- Other Apps
फ़िज़ाओं ये बन्दिशें न लगाओ मुझ पर, मैं आवारा हूँ हर गिरफ्त छोड़ जाउँगा.........१ हवाओं न इस तरह इतराओ ख़ुद पर, मैं आज़ाद पँछी हूँ तेरी जद से तेज उड़ जाउँगा.......२ बादलोँ यूँ गरज़ कर न डराओ मुझे, मैं बंजर ज़मीन हूँ हर बूँद निगल जाऊँगा.............३ पहाड़ों न ऊँचाइयों का ख़ौफ़ कराओ मुझको, मैं बाज हूँ तुझसे ऊँचा उड़कर निकल जाऊँगा.........४ दरियाओं न गहराई का मुझको वास्ता देना, मैं साग़र हूँ तुझे ख़ुद के अन्दर समा जाऊँगा..........५ तमाम दौलतों की मुझे रिश्वतें मत देना, मैं फ़क़ीर हूँ हर ख़ज़ाने से मुँह मोड़ जाऊँगा.............६ न इश्क़ - न हुस्न की तलब मुझमेँ रह गयी है, मैं बेख्याल हूँ तुझको कर बेहाल छोड़ जाऊँगा...........७ न महलों की ख़्वाहिश न रेशम की ही जरूरत है, मैं बंजारा हूँ फटे-हाल हो आसमाँ को छत बनाऊँगा........८ न लोगोँ की न शहरों की ही लज़्ज़त है मुझको, मैं रिन्द हूँ मयख़ाने में ही हद से गुज़र जाऊँगा............९ न जीने - न मरने की दास्ताँ सुनाओ तुम, मैं इश्क़ से गुजरा हूँ हर ज़हर निग़ल जाऊँगा..............१०
कांवड़ यात्रा - आस्था के नाम पर खिलवाड़
- Get link
- X
- Other Apps
मैं पिछले 8-10 सालों से ऋषिकेश आ रहा हूँ, लेकिन इतना गन्दा और घटिया माहौल यहाँ कभी नहीँ देखा, जितना कि ये श्रावण महीने के 10-15 दिनों ने दिखा दिया है, माफ कीजियेगा लेकिन मैं बात कर रहा हूँ भोले बाबा के भोले भक्तों की, जिनकी वजह से यहाँ पर आये भारतीय परिवार और विदेशी सैलानियों का जीना और खुल कर घूमना हराम हो गया है, ये लोग कहने को तो भोले के भक्त हैं, और यहाँ पर कांवड़ लेकर आये होते हैं, लेकिन ये कांवड़ यात्रा भक्ति और आस्था का विषय न होकर इनकी कुंठित मानसिकता को पूर्ण करने का एक साधन मात्र रह गया है, इस पूरी यात्रा के दौरान शायद इन्हें इतना पुण्य मिल जाता है कि ये किसी गरीब को सताने, लड़कियों पे बुरी नजर और अश्लील टिप्पणी करने, मादक नशे, झगड़ा, गाली-गलौच, शोर-गुल और किसी भी तरह की असामाजिक कुकृत्यों से इन्हें माफी मिल जाती होगी, कहने को मेरी बातें जरूर बुरी लगेंगी, लेकिन जो मैंने इस कांवड़ यात्रा के दौरान देखा उनमे से कुछ एक बेहद आम मग़र जिसके साथ होता है उसके लिए श...
कोई और भी है तेरा
- Get link
- X
- Other Apps
कोई और भी है जो तेरे करीब रहता है शायद, आखिर यूँ ही तो नहीँ तुम मुझसे दूरियाँ बढ़ा रहे होे.....1 कोई और भी है जो तेरा ख्याल रखता है शायद, आखिर यूँ ही तो नहीँ तो बेख्याल होते जा रहे हो......2 कोई और भी है जो तुझसे वफ़ा कर रहा है शायद, आखिर यूँ ही तो नहीँ तुम बेवफा होते जा रहे हो.......3 कोई और भी है जो तेरे हुस्न का मुरीद है शायद, आखिर यूँ ही तो नहीँ तुम बेफिकर होते जा रहे हो......4 कोई और भी है जो तुझे याद करता है हरदम आखिर यूँ ही तो नहीँ तुम मुझको भुला रहे हो.........5 कोई और भी है जो तुझे बेइंतेहा चाहता है शायद, आखिर यूँ ही तो नहीँ तुम मेरी चाहतें भुला रहे हो......6 कोई और भी है जो तेरे ख़्वाबों में बस रहा है आखिर यूँ ही तो नहीँ तुम मुझे रक़ीब बुला रहे हो.......7 कोई और भी है जो तेरी साँसों में महक रहा है आखिर यूँ ही तो नहीँ तुम बहकते जा रहे हो..........8 कोई और भी है जो तेरी नज़रों में रहने लगा है आखिर यूँ ही तो नहीँ तुम मुझसे नजरें फिरा रहे हो.....9 कोई और भी है जो तुझको अपना सा लग रहा है, आखिर यूँ ही तो नहीँ तुम गैर होते जा रहे हो........10
तेरे जिस्म को चाहने वाले
- Get link
- X
- Other Apps
फ़िकर तेरी भी होती है मुझको कभी - कभी, न जाने किस मोड़ पर तुझको छोड़ जाये तेरे जिस्म को चाहने वाले.......१ खैर, अब होना भी क्या है तेरा भला मेरे हांथो, तकलीफ ये है कि क्या न क्या तकलीफ दे जायें तेरे हुस्न को चाहने वाले.....२ कब तुमने सुनी है मेरी कब मुझको तवज्जो दी है, मुआमला ये है कि किस वक्त रुला जायें तुझे तेरे शोख लबों पे मरने वाले.......३ आराम तुमको भी नहीँ है और सुकून मुझको भी नहीँ है, लौट आना जब तुझपे बेरहम हो जायें वो तेरे गेसुओं में सोने वाले......४ लौटकर आयेगा नहीँ अब वो वक्त मोहब्बत वाला, याद करना मुझे जब तुझे भूल जायें वो तेरे आगोश में सिमतबे वाले.....५ कहकशे लगाते हैं लोग ठहाके देते हैं, तुम सम्हल जाना जरा जिन्दा ही मौत दिखा देते हैँ वफ़ाओं से मुकरने वाले.....६ अब तलक कयी रँग देखे हैं मैने दुनिया के, आँखे बन्द कर लेना जब तुझे बेरंग कर जाये वो तेरे गोरे रँग पे लुटने वाले...७ क्या खता की थी कभी मैंने दौर-ऐ-इश्क में कोई, आँसू बहाने की भी खता मत करना जब एक खता पे बिफर जाये तेरी हर खता माफ करने वाले.......८ ख्वाब मैंने भी बहुत देखे थे तुझे आँखों ...